अगर आप सोचते हैं कि सिगरेट न पीने वालों को फेफड़ों का कैंसर कभी नहीं होगा, तो यह सोच अब बदलने का समय आ गया है। आज धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है, और डॉक्टरों के लिए भी यह चिंता का विषय बन गया है। लखनऊ में मरीजों को सही जानकारी और सही इलाज देने के लिए Dr. Harshit Srivastava, जिन्हें Best Surgical Oncologist माना जाता है, अक्सर बताते हैं कि यह बीमारी सिर्फ स्मोकर्स तक सीमित नहीं रही। आइए इस लेख में समझते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इससे कैसे बचा जा सकता है।
लंबे समय से लोग यह मानते आए हैं कि फेफड़ों का कैंसर केवल सिगरेट या बीड़ी पीने वालों को होता है। लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है।
भारत में फेफड़ों के कैंसर के करीब 40 से 50% मरीज ऐसे होते हैं जिन्होंने जीवन में कभी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया। यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, लेकिन सच है।
फेफड़ों का कैंसर बिना धूम्रपान के भी हो सकता है, और इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
इन सभी कारणों पर हम आगे विस्तार से बात करेंगे।
पिछले कुछ सालों में दुनियाभर में एक अजीब ट्रेंड देखा गया है। एक तरफ धूम्रपान करने वालों की संख्या घट रही है। दूसरी तरफ, गैर-धूम्रपानकर्ताओं में फेफड़ों के कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
रिसर्च बताती है कि एडेनोकार्सिनोमा नाम का फेफड़ों का कैंसर उन लोगों में सबसे ज्यादा पाया जा रहा है जो कभी धूम्रपान नहीं करते। यह कैंसर फेफड़ों के बाहरी हिस्सों में शुरू होता है और शुरुआत में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं।
इसका मतलब साफ है — सिर्फ सिगरेट से दूरी बनाना काफी नहीं है। हमें अपने आसपास के माहौल पर भी नजर रखनी होगी।
अब बात करते हैं उन असली वजहों की, जो बिना सिगरेट पिए भी किसी को फेफड़ों का कैंसर दे सकती हैं। यही असली फेफड़ों के कैंसर के कारण हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है।
शहरों में बढ़ता प्रदूषण अब सिर्फ आंखों में जलन या खांसी तक सीमित नहीं है। हवा में मौजूद बारीक कण (PM2.5) सीधे फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। लगातार इस तरह की हवा में सांस लेने से कैंसर का खतरा धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।
अगर आप खुद सिगरेट नहीं पीते, लेकिन घर या दफ्तर में किसी धूम्रपान करने वाले के साथ रहते हैं, तो भी खतरा कम नहीं होता। ऐसे लोगों में फेफड़ों के कैंसर का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है, क्योंकि सिगरेट का धुआं सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचता ही है, चाहे उसे पीने वाला कोई और हो।
यह एक ऐसी प्राकृतिक गैस है जो जमीन से निकलती है और बंद घरों में जमा हो सकती है। इसे न तो देखा जा सकता है, न सूंघा जा सकता है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहना फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।
जो लोग निर्माण कार्य, फैक्ट्री या खनन जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं, वे अक्सर एस्बेस्टस और अन्य हानिकारक रसायनों के संपर्क में आते हैं। यह एक्सपोजर धीरे-धीरे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है।
अगर परिवार में पहले किसी को फेफड़ों का कैंसर हो चुका है, तो यह जोखिम को बढ़ा सकता है। कुछ लोगों में जन्मजात जीन बदलाव भी होते हैं, जो उन्हें इस बीमारी के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाते हैं।
भारत के कई घरों में अभी भी लकड़ी, कोयला या उपले जलाकर खाना बनाया जाता है। बिना हवादार रसोई में लगातार धुएं के संपर्क में रहना, खासकर महिलाओं में, फेफड़ों के कैंसर का एक अनदेखा लेकिन गंभीर कारण बनता जा रहा है।
फेफड़ों का कैंसर शुरुआत में अक्सर आम सर्दी-खांसी जैसा ही लगता है। यही वजह है कि इसका पता देर से चलता है। इन संकेतों पर ध्यान दें:
अगर इनमें से कोई भी लक्षण दो-तीन हफ्तों से ज्यादा बना रहे, तो डॉक्टर से जांच जरूर करवाएं।
पूरी तरह से जोखिम खत्म करना मुश्किल है, लेकिन कुछ आदतें अपनाकर खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है:
फेफड़ों का कैंसर जितनी जल्दी पकड़ में आ जाए, इलाज उतना ही आसान और असरदार होता है। शुरुआती स्टेज में सर्जरी से इसे पूरी तरह हटाया जा सकता है। इसीलिए किसी अनुभवी विशेषज्ञ से समय पर सलाह लेना बहुत मायने रखता है।
अगर आपको या आपके किसी परिचित को ऊपर बताए गए लक्षण नजर आ रहे हैं, तो देर न करें। सही जांच और सही सलाह ही समय पर बीमारी पकड़ने की कुंजी है।
लखनऊ में इलाज के लिए विशेषज्ञ की तलाश कर रहे मरीजों के लिए एक भरोसेमंद विकल्प चुनना जरूरी है, ताकि सही निदान और उपचार योजना मिल सके।
फेफड़ों का कैंसर अब सिर्फ धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं रह गया है। प्रदूषण, सेकेंड हैंड स्मोक, रसोई का धुआं और जेनेटिक कारण, ये सभी मिलकर इस बीमारी को गैर-धूम्रपानकर्ताओं तक भी पहुंचा रहे हैं। सही जानकारी, समय पर जांच और सतर्क जीवनशैली अपनाकर इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अपने शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करें और किसी भी असामान्य लक्षण को हल्के में न लें।
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